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Friday, 20 December 2013

कहानी मिल्खा सिंह की |

1947 का वक़्त और भारत का बटवारा जिन लोगो ने देखा और भोग है वो उस मंज़र को अपनी पूरी ज़िन्दगी में नहीं भूल सकते हैं !नफरत की लहर ने जाने कितने मासूमो की ज़िन्दगी छिन ली और कितनो को अपनों से हमेशा के लिए दूर कर दिया !बटवारे के वक़्त बहुत सारे लोग भारत से पाकिस्तान और पाकिस्तान से भारत आये इन में बहुत ऐसे लोग ऐसे भी थे जो अपने पुरे परिवार को खो दिए थे नफरत की आग ने उन के परिवारों को लील लिया था उन्ही लोगो में एक सिख बच्चा भी पाकिस्तान से अपनी जान बचा के बहुत मुस्किल से भारत आया था जिसका नाम था मिल्खा सिंह जिसको आज पूरी दुनिया फ्लाइंग सिख के नाम से भी जानती है!




मिल्खा सिंह का जन्म 8 अक्तूबर 1935 को लायलपुर जो अब पाकिस्तान में है हुवा था बटवारे के वक़्त हुवे दंगो में मिल्खा के पुरे परिवार की हत्या कर दी गई थी और मिल्खा किसी तरह अपनी जान बचाते हुवे भारत आ गए !भारत आने के बाद मिल्खा सिंग ने अपनी ज़िन्दगी फुटपाथ पर बितानी शुरू की थी उन्हों ने अपनी जीवका चलने के लिए होटलों में बर्तन मांजने लगे थे लेकिन उसी वक़्त उन्हों ने ये ठान लिया की वे खुद अपनी तक़दीर लिखेंगे ऐसी ज़िन्दगी नहीं जियेंगे और फिर मिल्खा सिंह ने 1958 के एशियाई खेलों में 200 मीटर और400 मीटर की दौड़ में भारत के लिए स्वर्ण पदक कर नया इतिहास रचा ! इसी दौरान मिल्खा सिंग को पाकिस्तान में भारत की ओर से दौड़ने का न्योता मिला लेकिन बचपन की कटु यादो की वजह से मिल्खा सिंह पाकिस्तान नहीं जाना चाहते थे ,जब ये खबर तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरु जी को हुवी तो उन्हों ने मिल्खा सिंह को बुलाया और उन्हें समझाया की यही वो वक़्त है जब आप अपना और अपने देश का नाम दुनिया में ऊँचा कर सकते हो !फिर मिल्खा सिंह पाकिस्तान गए लाहोर के 60 हज़ार दर्शकों से खचा-खच भरे स्टेडीयम में मिल्खा सिंह ने उस वक़्त के पाकिस्तान के सब से तेज़ धावक अब्दुल कादिर को 200 मीटर और 400 मीटर की दौड़ में हरा दिया,उस दौड़ को पाकिस्तान के तत्काल रास्ट्रपति जनरल अयूब भी स्टेडीयम में बैठ के देख रहे थे और वे मिल्खा सिंह से इतने प्रभावित हुवे की मेडल को मिल्खा सिंह के गले में डालते वक़्त उन्हों ने मिल्खा सिंह से पंजाबी में कहा "मिल्खा सिंह जी, तुस्सी पाकिस्तान दे विच आके दौडे नइ, तुस्सी पाकिस्तान दे विच उड़े ओ, आज पाकिस्तान तौन्नू फ्लाइंग सिख दा ख़िताब देंदा ए" जिसका हिंदी में मतलब हुवा की "तुम ने पाकिस्तान में दौड़ा नहीं है बल्कि उड़ा है और आज पाकिस्तान आप को फ्लाइंग सिख का ख़िताब देता है " और फिर वही पाकिस्तान से पूरी दुनिया मिल्खा सिंह को फ्लाइंग सिख के नाम से जानने लगी लाहोर दौड़ के बाद पाकिस्तानी धावक जिनको मिल्खा सिंह ने हराया था मिल्खा सिंह के अच्छे दोस्त हो गए थे 1962 के जंग में बंदी बनाये जाने के बाद पाकिस्तानी धावक अब्दुल कादिर जो सेना में थे मिल्खा सिंह से मिलना चाहा था और मिल्खा सिंह उनसे मेरठ जेल में मिले और दोनों दोस्त गले लग के बहुत देर तक खूब रोये थे !

मिल्खा सिंह ने 1956 के मेलबर्न ओलम्पिक ,1960 के रोम ओलम्पिक और 1964 के टोक्यो ओलम्पिक में भारत की तरफ से हिस्सा लिया बाद में उन्हें पद्मश्री की उपाधि से नवाज़ा गया!1960 में मिल्खा सिंह ने रोम ओलम्पिक में भारत के तरफ से हिस्सा लिया था लेकिन वो वहा कोई मैडल नहीं जित सके थे बाउजुद इसके रोम ओलम्पिक मिल्खा सिंह के ज़िन्दगी में एक नया मोड़ ले के आया यही पर उनकी मुलाकात निर्मल जी से हुई थी जो अब उनकी पत्नी हैं ,निर्मल जी महिला वोलीबाल की कप्तान थी !

मिल्खा सिंह का जूता जिसको उन्हों ने टोक्यो ओलम्पिक में पहना था 24 लाख में नीलाम हुवा था लेकिन इसकी कहानी भी बहुत रोचक है !

जापान से लौटने के बाद देश भर में मिल्खा सिंह के चाहने वाले उन्हें चिठ्ठी,तार,पार्सल,बधाई पत्र भेज रहे थे इसी दौरान मिल्खा सिंह के लिए एक पार्सल जापान से आया जिसको लेने के लिए भारतीय कस्टम विभाग ने 85 रूपये कस्टम ड्यूटी भरने को कहा !मिल्खा सिंह ने85 रूपये भर के उस पार्सल को छुड़ा लिया ,घर आने के बाद बहुत उत्साह से मिल्खा सिंह ने जब पार्सल खोल तो उसमे से एक जोड़ी फटा हुवा जूता गिरा और साथ में एक पत्र था जिसमे लिखा था की आप ने गलती से अपना जूता होटल में भूल के चले गए थे जब की वास्तविक बात ये थी की मिल्खा जी ने जान बुझ के वे जूते वहा छोड़ दिए थे की बाद में होटल के सफाई कर्मचारी उस जूते को फेंक देंगे !ये वही जूते थे जिनको मिल्खा सिंह ने टोक्यो ओलम्पिक में पहना था और बाद में ये जूते 24 लाख रूपये में नीलम हुवे !    

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